जाने बिहार के गयाजी में ही क्यों होता है पिंडदान, क्या है इसकी वजह? जानिए इसका इतिहास

Pind Daan History: बिहार का गया क्षेत्र, जिसे लोग प्यार से “गयाजी” कहते हैं, धार्मिकता और परंपरा का एक महत्वपूर्ण स्थान है। यह धार्मिक नगरी न सिर्फ अपने प्राचीन मंदिरों के लिए जानी जाती है, बल्कि अपनी मान्यताओं और प्रथा भी विशेष महत्व है।इस लेख में, हम गया जिले की धार्मिकता, परंपराएँ और यह पर लोग पिंडदान क्यों करते हैं। यह जानेंगे।
गया जिला जिसे ‘धार्मिक नगरी’ के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि यहां हर कोने-कोने पर प्राचीन मंदिर हैं जिनमें स्थापित मूर्तियां प्राचीन काल की बताई जाती हैं। यहां के मंदिर और तीर्थ स्थलों में दिखाई देने वाली श्रद्धालु और आस्थाएं इसे एक आध्यात्मिक और धार्मिक स्थल बनाती हैं।
ऐसा माना जाता है कि भगवान राम, सीता और लक्ष्मण जी गयाजी की धरती में अपने पावन कदम रखे थे और उन्होंने यहाँ अपने पिता का पिंडदान किया था। तब से ही गयाजी में पिंडदान करने की महत्ता शुरू हो गई थी। इस प्रकार, पिंडदान करने से पूर्वजों की मोक्ष की प्राप्ति होती है। और यहाँ देश-विदेश से लोग अपने पूर्वजों की मोक्ष की कामना के लिए गयाजी आते हैं।
कब और किसने की पिंडदान की शुरुआत
आपको बता दे कि भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष के 15 दिनों को ही पितृपक्ष कहा जाता है।और गरुड़ पुराण के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि गयाजी में पिंडदान की शुरुआत सबसे पहले भगवान् राम जी ने की थी। ऐसा कहा जाता है कि भगवान् राम अपने पिता दशरथ जी की मृत्यु के पश्चात उनका पिंडदान करने गया जी आये थे। और तब से ही इस पिंडदान की शुरुआत हुई।
पितृपक्ष के कृष्ण पक्ष में गयाजी में पितृदेवों की प्रतिष्ठा का एक विशेष मेला आयोजित होता है। इस महत्वपूर्ण उत्सव में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु आते हैं और अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए पिंडदान करते हैं।
गयाजी में पिंडदान करने से 108 कुल का होता है उद्धार
गयाजी में पितृपक्ष के समय में तीर्थयात्री पिंडदान या तर्पण करने के लिए देश-विदेश से लाखो लोग आते है। और यह मान्यता है कि गयाजी में पिंडदान करने से 108 जनजाति और 7 पीढ़ी का उद्धार हो जाता है और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।