बिहार के 24 वर्षीय शशांक ने बना दी 4000 करोड़ की कंपनी,जीते लाखों किसानों के दिल

shashank kumar dehaat biography

इस शख्स का नाम सत्संग कुमार है जोगी देहात नामक कंपनी के फाउंडर और सीईओ हैं| आज हम इस लेख के माध्यम से आपको शशांक कुमार की सफलता की कहानी आपके समक्ष रखने वाले हैं|

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शशांक कुमार DeHaat CEO

शशांक एक बीटेक आईआईटी दिल्ली का स्टूडेंट है जो कि अपने द्वारा दिए गए आईडिया के द्वारा किसानों से मिलकर करते हैं खेती इनकी पूरी जिंदगी का लेखा-जोखा इस लेख में अच्छे तरीके से दिया गया

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अपने दोस्तों के साथ शशांक

शैतान की कहानी 1980 के दशक में बिहार के लोअर मिडल क्लास सेवन में एक गरीब इंसान की है जहां पर पेरेंट्स की एक ही इच्छा होती है कि बच्चा बिहार के बाहर चला गया वह ग्रामीण रूलर परिवेश से बहुत दूर चला जाए और वहां जाकर सेटल हो जाए और अच्छी नौकरी पकड़कर अच्छा पैसा कमाने लगे

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अपने पूरे टीम के साथ

दो भाई और एक बहन के साथ एक सम्मिलित परिवार छपरा के एक बहुत छोटे से गांव इनके साथ 8 साल गुजरी है| शशांक के बड़े भाई का दाखिला सैनिक स्कूल में जब छोटे में हो जाता है तब उस समय बहुत ही गौरव के बाद इनके परिवार के लिए थी।

 

 

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खेत में निरीक्षण के दौरान देहात की टीम

सैनिक स्कूल में बड़े भाई के दाखिला हो जाने के बाद इनके माता-पिता काफी चिंतित और हैरान भी थे क्योंकि अच्छे स्कूल में पढ़ने के लिए अच्छे पैसे भी लगते हैं इसी को लेकर चिंतित थे शशांक के माता-पिता

उसी दौरान शशांक को नेतरहाट के किसी अच्छे स्कूल के बारे में पता चलता है जहां पर पढ़ाई भी अच्छी तरीके से होती थी और सबसे जरूरी स्कॉलरशिप 100 परसेंट थी और वहीं पर गांव में समाज में किसी ने कहा कि उस स्कूल में जाओगे तो शायद लाइफ बन जाएगी।

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आलू की खेत में बैठे शशांक और उनकी टीम

अब सोचिए 11 – 12 साल की उम्र मैं कुछ 12000 बच्चों ने उस स्कॉलरशिप का परीक्षा दिया तब जाकर 100 बच्चों की मेरिट लिस्ट निकली जिसमें शशांक का नाम उस लिस्ट में शामिल था। शशांक अपना बैग पैक किए और नेतरहाट के स्कूल में दाखिला ले लिया।

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कंपनी के अंदर की तस्वीरें

 

जब शशांक नेतरहाट के स्कूल में चले गए वहां अपने पढ़ाई करने लगे तब इनको किसी ने कहा कि दसवीं में अगर अच्छे नंबर आ गए तो लाइफ बन जाएगी क्योंकि वही से आपको अच्छे साइंस कॉलेज में एडमिशन मिल जाएगा इसी को सुनकर शशांक जमकर मेहनत करने लगे।

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अपने बिजनेस को प्रमोट करने के लिए किसानों के पास स्वयं जाती है टीम

शशांक उस स्कूल से दसवीं अच्छे नंबर से पास कर लिया साथी शायद स्टेट टॉपर भी रहे उसके बाद किसी ने कहा कि आईआईटी का एग्जाम अगर अच्छे से निकाल लिया तो लाइफ बन जाएगी तो शशांक ने कहा चलो ऐसा भी कर लेते हैं 2 साल की तो और बात है।

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DEHAAT की पूरी टीम

फिर शशांक ने जमकर 2 साल मेहनत किया और किस्मत ने दिया साथ आईआईटी में भी अच्छे नंबर आए 2004 में इनका दाखिला आईआईटी दिल्ली में हो गया यहां एडमिशन लेने के बाद शशांक के जीवन में फिर से एक नया मोड़ आया लोगों ने कहा कि अच्छी नौकरी लग जाए तो कैरियर मानो एकदम सेट है।

कुल मिलाकर के लाइफ की जर्नी ऐसी रहे जहां लोगों ने आपको गाइड किया जहां गांव समाज आपके परिवेश में आपको बताया कि आपको क्या करना चाहिए हां अच्छी बात यह थी कि शायद रिजल्ट की परवाह किए बगैर जिनवारियो को समझते हुए पूरी कोशिश की और हर एक मुकाम पर सफलता हासिल करते गए

म****** एगो

साल 2008 में शशांक अपने कॉलेज से निकले उसके बाद इनकी अच्छी नौकरी लग गई अच्छे पैसे मिलते थे आराम की जिंदगी थी लगभग ढाई से 3 साल वहां पर नौकरी भी कि उसके बाद शशांक को समझ में आ गया कि शायद कुछ तो खास है।

शायद अपने आप को समझने का मौका मिला शायद उन्हें शुरुआती दिनों में जो जिम्मेदारियों का एहसास हुआ था उसी को लेकर खुद को सोचा तो आखिर मैं क्या हूं मेरे में क्या खास है तो इन्हें रियल आइज हुआ कि कुछ ऐसा करने में जाना सामने वाले तक कभी कुछ भला हो रहा है तब शशांक को बहुत अच्छा लगता था।

शशांक ने अपने भागदौड़ भरी जिंदगी के छह 7 साल का अच्छे से जायजा लिया और अपने आप को तराशा उसके बाद शशांक के मन में सबसे अहम हिस्सा जो था वह था किसानी खेती बाड़ी गांव

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साल 2010 में एग्रीकल्चर के तरफ शशांक ने रुक मोड़ा और उनके कहने के मुताबिक भारत में 14 करोड़ की शान है जो कि शायद भारत पूरे विश्व को खाना खिला रहे हैं और खुद भूखे हैं।

24 साल की उम्र में नौकरी छोड़कर दिल्ली से बिहार आए थे शशांक बैग टांग कर किसानों से ग्राउंड पर जाकर करते थे मुलाकात इनको लगता था कि मैं यहां इतिहास रचने आया हूं।

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फिर वहां जाकर लगता है कि वहां इसकी किसी को जरूरत ही नहीं है जो जैसा है वैसा ठीक है जो जैसा कमा रहा है वैसा रहना चाहता है कोई भी अधिक दिमाग नहीं लगाना चाहता। किसान जिसके लिए आप काम करने जा रहे हैं उनको लगता है कि 24 साल का यह बच्चा क्या ही बता पाएगा एग्रीकल्चर के बारे में

3 से 4 महीने के कड़ी मशक्कत के बाद शुरुआत में 14 किसानों ने शशांक की बातें में हामी भरी और कहा चलो ठीक है। आप जिस तरह से बताइएगा उस तरीके से खेती करेंगे ऐसा किसानों का कहना था तो फिर क्या था शशांक ने पीछे मुड़कर कभी देखा ही नहीं और किसान भाइयों के साथ अपनी प्लानिंग बताकर करने लगे खेती