बिहार के इस अनोखे मंदिर में लंगोट चढ़ाते है लोग, पूरी होती है भक्तों की मनोकामना

आपने बहुत से मंदिरो के बारे में सुना होगा जहा भक्त लोग अपनी आस्था और विश्वास से अपनी मनोकामना को पूरी करने के लिए चढ़ावा चढ़ाते है, और मन्नत मांगते है। आज हम ऐसे ही बिहार के नालंदा में स्थित मंदिर के बारे में बताने जा रहे है जहाँ पर भक्तजन अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए लंगोट चढ़ाते है।
बिहार के नालंदा में स्थित बाबा मणिराम अखाडा मंदिर भारत का एक ऐसा मंदिर होगा जहा लोगो की मनोकामना पूरी होने पर भक्त अपनी आस्था से लंगोट चढ़ाते है। इस मंदिर में हर साल आषाढ़ पूर्णिमा से सात दिवसीय मेला लगता है। जहाँ अलग-अलग राज्यों से लाखो की संख्या में श्रृदालु आते है जहाँ वे लोग मणिराम अखाडा बाबा की समाधी पर लंगोट चढ़ाते है।
वर्षो से चली आ रही इस परम्परा के अनुसार यहाँ सबसे पहले पुलिस और प्रशासन के अधिकारी बाबा की समाधी पर लंगोट चढ़ाते है। इसके बाद इस मंदिर में मेले की शुरुआत की जाती है।
हर साल निकलता है लंगोट जुलुस
हर साल इस मंदिर से लंगोट जुलुस निकाला जाता है। लेकिन इस साल रामनवमी में हिंसक झड़प के कारण लंगोट जुलुस को ढोल नगाड़े और धूम धाम से नहीं निकालता जायेगा। नालंदा स्थित इस मंदिर के समिति की पुजारी विश्वनाथ मिश्रा जी ने बताया कि बाबा मणिराम जी अयोध्या से चलकर नालंदा में 1238 ई. में आये थे। उस समय बाबा ने दक्षिणी और पर पंचाने नदी के पिस्ता घाट में अपना पूजा का स्थल बनाया था। वही स्थल आज अखाडा के नाम से जाना जाता है।
बाबा करते थे माँ भगवती की पूजा
बाबा मणिराम जी जंगल में रहकर ज्ञान को प्राप्त करने और शांति के लिए माँ भगवती की पूजा किया करते थे। और साथ साथ लोहो को कुश्ती भी सिखाया करते थे। आपको बता दे कि नालंदा में लंगोट मेले की शुरुआत उत्पाद निरीक्षक कपिलदेव प्रसाद के प्रयास से 6 जुलाई 1952 को बाबा के समाधि के स्थल में किया गया। लंगोट मेले मनाने के पहले भक्त यहाँ पर रामनवमी के मौके में बाबा की समाधी पर पूजा करने आया करते थे। लंगोट मेले की शुरुआत करने के बाद हर साल यहाँ आषाढ़ पूर्णिमा के दिन से सात दिवसीय मेला लगता है।
बाबा के दरबार में आते है लाखो शृद्धालु
ऐसा माना जाता है कि बाबा मणिराम अखाडा की कृपा इतनी है कि उनके दरवार में आया भक्त खाली हाथ नहीं लौटता है। यहाँ पर लोगो के सच्चे मन से मांगी गयी कामना जरूर पूरी होती है। इसी कारण यहाँ पर हर साल लाखो की संख्या में शृद्धालु आते है। यहाँ बताया जाता है कि बाबा मणिराम और महान सूती संत मखदूम साहब की गहरी दोस्ती है। यहाँ पर ऐसा कहा जाता है की एक बार बाबा दिवार में बैठ कर दातुन कर रहे थे। और मखदूम साहब जी ने उनसे मिलने की इच्छा जाहिर की और जिस दीवार में वह बैठे थे उस दिवार को चलने का आदेश दिया तो वह चलने लगी। इन दोनों संतो की दोस्ती की लोग आज भी मिसाल देते है।